मंगलवार, 15 सितंबर 2009

मैली चादर...........


मैली चादर ओढ़ के कैसे द्वार तुम्हारे आऊँ
हे पावन परमेश्वर मेरे मन ही मन शरमाऊँ
तुमने मुझको जग में भेजा निर्मल देके काया
आकर के संसार मैं मैंने इसको दाग लगाया
जनम जनम की मैली चादर कैसे दाग छुडाऊँ
निर्मल वाणी पाकर तुझसे नाम ना तेरा गाया
नयन मूंदकर हे परमेश्वर कभी ना तुझको ध्याया
मन वीणा की तारें टूटी अब क्या गीत सुनाऊँ
इन पैरों से चलकर तेरे मंदिर कभी न आया
जहाँ जहाँ हो पूजा तेरी कभी न शीश झुकाया
हे हरिहर मैं हार के आया अब क्या हार चढाऊँसा
हरि ओम शरण के स्वर में :
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अनूप जलोटा के स्वर में:

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रविवार, 13 सितंबर 2009

नन्द-नंदनम

करो मन नन्द नंदन को ध्यान।
यह अवसर तोहे फिर ना मिलेगो, मेरो कहो अब मान॥
घूँगर वाली अलकें उसपर, कुंडल झलकत कान।
नारायण अलसाने नयना, झूमत रूप निधान॥






सोमवार, 7 सितंबर 2009

गोविन्द दामोदर माधवेति

ना मैं वैकुण्ठ में रहता हूँ और ना मैं योगियों के हृदय में बसता हूँ। हे नारद! जहाँ मेरे भक्त मेरा कीर्तन करते हैं, मैं वहीं रहता हूँ।

कौन सी ने कर दियो री टोना............




शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

मैं नहि माखन खायौ


प्रबल प्रेम के पाले पड़कर, प्रभु को नियम बदलते देखा,
अपना मान रहे ना रहे, पर भक्त का मान ना टलते देखा,
जिसकी केवल कृपा दृष्टि पर, सकल विश्व को पलते देखा,
उनको गोकुल के गौरस पर, सौ सौ बार मचलते देखा।

सोमवार, 24 अगस्त 2009

बिल्वमंगल


भगवान् श्री कृष्ण के अनेक अनन्य भक्त हुए हैं जिन्होंने अपने एकनिष्ठ प्रेम, समर्पण और भगवद ज्ञान से लोकमानस में भक्तिभाव का संचार किया। ७०० वर्ष पहले केरल में ऐसे ही एक असाधारण भक्त बिल्वमंगल हुए। कहा जाता है कि उन्हें एक वेश्या चिंतामणि से प्रेम हो गया था। एक बार उन पर उससे मिलन की उत्कंठा इतनी हावी हो गई कि पिता का क्रिया कर्म करते ही वे उससे मिलने दौड़ पड़े। तेज वर्षा में भी वे आगे बढ़ते रहे। वासना में डूबे हुए बिल्वमंगल ने तैरते शव पर चढ़ कर नदी को पार किया और दीवार पर लटकते साँप को पकड़कर अपनी प्रेयसी के पास पहुँच गये। जब चिंतामणि ने भीगे हुए बिल्वमंगल के हृदय की कामाग्नि देखी तो सलाह दी, "तुम माँस और हड्डी से बने इस तन की बजाय अचिंत्य भगवान श्रीकृष्ण से प्रेम करते तो तुम्हे पूर्ण और शाश्वत सुख मिल जाता।" बिल्वमंगल की चेतना लौटी और वे तुरंत वृंदावन चल पड़े। उन्होंने श्रीकृष्ण प्रेम की सुन्दर व मधुर कृति ‘श्रीकृष्ण कर्णामृतं’ के प्रथम श्लोक का आरम्भ आभार स्वरुप ‘चिंतामणि जयति.....’ से किया है। । श्री राधा-कृष्ण की माधुर्य पूर्ण लीला में प्रवेश के बाद उनका नाम लीला शुक हो गया। वे उन्मत्त होकर गोविन्द लीलागान करते थे। वे वृन्दावन में ब्रह्म कुंड के पास कुटिया में रहने लगे। भगवान् बालक रूप में उनके साथ खेला करते। लीला शुक उन्हें लाड़ से उन्नी बुलाया करते थे। उन्होंने ही माधुर्य लीला में श्रीमती राधारानी की सर्वोच्चता स्थापित की। उन्हीं के आधार पर ही, बाद में छह गोस्वामियों आदि संतों ने श्री राधा-कृष्ण लीला रूप को आधार बनाया और श्रीराधा भाव का विस्तार किया । बिल्वमंगल अर्थात लीला शुक की समाधि वृंदावन के गोपीनाथ बाज़ार में है।
लीला शुक द्वारा रचित ‘श्रीकृष्ण कर्णामृतं’ तीन अध्यायों में निबद्ध है और इसका एक-एक श्लोक कांतिमय मोती के समान है। इसी मधुर कृति में से प्रस्तुत है- एक उज्जवल मोती जिसमें भगवान् श्रीकृष्ण की स्तुति बहुत भावपूर्ण एवं रसपूर्ण ढंग से की गई है। पहले श्लोक है, उसके बाद इसका अर्थ दिया गया है। श्लोक रूपी मोती को ओजस्वी स्वर में पिरोया है, संगीत मार्तंड जसराज ने।

कस्तूरी तिलकं ललाट पटले वक्ष: स्थले कौस्तुभं ।
नासाग्रे वरमौक्तिकं करतले वेणु: करे कंकणं॥
सर्वांगे हरि चन्दनं सुललितं कंठे च मुक्तावली।
गोपस्त्रीपरिवेष्टितो विजयते गोपाल चूडामणि: ॥

'हे श्रीकृष्ण! आपके मस्तक पर कस्तूरी तिलक सुशोभित है। आपके वक्ष पर देदीप्यमान कौस्तुभ मणि विराजित है। आपने नाक में सुंदर मोती पहना हुआ है। आपके हाथ में बांसुरी है और कलाई में आपने कंगन धारण किया हुआ है। हे हरि! आपकी सम्पूर्ण देह पर सुगन्धित चंदन लगा हुआ है और सुंदर कंठ मुक्ताहार से विभूषित है। आप सेवारत गोपियों के मुक्ति प्रदाता हैं। हे ईश्वर! आपकी जय हो। आप सर्वसौंदर्यपूर्ण हैं।'

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